पर्यावरण और स्थिरता इंजीनियरिंग (डीईएसई) में आपका स्वागत है।
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व: | परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ || 11 ||
Devān bhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ, Parasparaṁ bhāvayantaḥ śhreyaḥ param avāpsyatha
(देवताओं/प्रकृति का पालन-पोषण करो, और वे तुम्हारा पालन-पोषण करेंगे; आपसी सहयोग से, तुम परम कल्याण प्राप्त करोगे)
- भगवद गीता, अध्याय 3, श्लोक 11
स्थिरता की मजबूत नींव पर आगे बढ़ते हुए, संस्थान ने वर्ष 2026 में पर्यावरण एवं स्थिरता अभियांत्रिकी विभाग (डीईएसई) की स्थापना की। यह विभाग सतत विकास के लिए मौजूदा और नए शोध, शिक्षण तथा जनसंपर्क गतिविधियों का एकीकरण करेगा। यह विभाग उभरती और वर्तमान गतिविधियों के समन्वय को प्रोत्साहित करेगा, जिससे संस्थान अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति—थार मरुस्थल—का लाभ उठाते हुए पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय प्रथाओं को अत्याधुनिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुसंधान के साथ जोड़ सके, और साथ ही आसपास के समुदायों में सार्थक, जमीनी स्तर पर प्रभाव प्रदर्शित कर सके।
समग्र रूप से, यह विभाग ज्ञान सृजन, क्षमता निर्माण और नेतृत्व विकास का एक सशक्त केंद्र बनेगा, जो अगली पीढ़ी के स्थिरता विशेषज्ञों और परिवर्तनकर्ताओं को तैयार करेगा। इसके अतिरिक्त, यह विभाग बहु-हितधारक सहभागिता के माध्यम से समग्र नीतिगत हस्तक्षेपों के विकास में योगदान देगा, जो संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों तथा भारत सरकार की स्थिरता पहलों के अनुरूप होंगे।
दृष्टि (Vision)
सतत विकास के लिए अंतर्विषयक अनुसंधान, नवाचार और शिक्षा के क्षेत्र में एक वैश्विक अग्रणी बनना; जिसके अंतर्गत उन्नत तकनीकों को पारंपरिक ज्ञान के साथ एकीकृत करके, सुदृढ़, समावेशी और समुदाय-केंद्रित प्रभावशाली पर्यावरणीय समाधान प्रदान किए जा सकें।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, जोधपुर में डीईएसई की प्रतिबद्धताएँ:
- प्रौद्योगिकी तथा पारंपरिक ज्ञान एवं प्रथाओं के समन्वय से सतत विकास में अत्याधुनिक शोध करना।
- एक स्थायी ग्रह के लिए ज्ञान, कौशल और मूल्य प्रणाली का विकास करना।
- पर्यावरण एवं स्थिरता से जुड़ी चुनौतियों के लिए नवोन्मेषी, सामाजिक एवं पारिस्थितिक दृष्टि से संवेदनशील समाधान विकसित करना और प्रदर्शित करना।
- व्यावहारिक परिवर्तन को बढ़ावा देने हेतु स्थिरता उद्यमिता को सक्षम बनाना।
- वैश्विक हरित परिवर्तन को प्रोत्साहित करना, जिससे अर्थव्यवस्थाओं का रूपांतरण हो और साक्ष्य-आधारित नीतिनिर्माण को दिशा मिले।